व्यक्तिनामा

अद्भुत इस्लामिक स्कॉलर मौलाना वहीदुद्दीन खान

कल जब मैंने मौलाना वहीदुद्दीन खान के निधन की खबर सुनी तो मुझे आश्चर्य हुआ कि अरे! अभी वो जिन्दा थे। मैं ये समझ रहा था कि शायद वो चले गये होंगे इसलिए बीते कई सालों से दिल्ली में उनका उल्लेख नहीं आता था। एक दो बार पूछा भी तो पता नहीं चला। लेकिन वो कल तक थे। वो 97 साल के थे। उन्होंने एक पूरा युग देखा। वो दौर भी जब इस्लाम के नाम पर भारत का बंटवारा हुआ और वो दौर भी जब मस्जिद ए जन्मस्थान को हटाया गया।
लेकिन इन सबके बीच मानों वो अडिग से थे। मैंने जीवन में दो बार उन्हें करीब से सुना था। एक बार दिल्ली में और एक बार ऋषिकेश में। वो समन्वयवादी मनुष्य थे। गैर मुस्लिमों के लिए कुरान की उन कठोर बातों को बहुत मुलायम तरीके से प्रस्तुत करते थे कि काफिर मोमिन का झगड़ा ही खत्म हो जाए।
मूलत: आजमगढ के रहनेवाले मौलाना वहीदुद्दीन खान साधु संतों के संपर्क में थे। ऋषिकेश में जहां मैंने उन्हें सुना था वहां स्वामी वेद भारती जी के आश्रम में वो एक आध्यात्मिक वक्ता के तौर पर आमंत्रित किये गये थे। वो भारत की उस आध्यात्मिक धारा से प्रभावित थे जहां प्रभुकृपा सबसे बड़ा ज्ञान होता है। मुझे याद है जब स्वामी जी ने उनसे कहा कि आप भी अपनी टेक्निक के बारे में बताएं तो वो भावुक हो गये? ईश्वर को प्राप्त करने की कोई टेक्निक हो सकती है क्या? वो तो सिर्फ उसकी कृपा होती है कि वह किसे प्राप्त हो जाए।
इसलिए उन्होंने इस्लाम के नाम पर जितना साहित्य रचा उसको आध्यात्मिक आधार देने का प्रयास किया। लेकिन भारत में बहुत छोटा सा ही वर्ग है जो उनके रास्ते पर चलता है। वो शायद इसलिए कि मौलाना वहीदुद्दीन खान जिस आध्यात्मिकता को इस्लाम में स्थापित कर रहे थे, उसके लिए वहां जगह ही नहीं है। फिर भी, मौलाना एक बेदाग चरित्र थे। आध्यात्मिक व्यक्ति। शांतचित्त और बहुत धीरे बोलनेवाले एक ऐसे सौम्य व्यक्ति जिनसे मिलने के बाद आप बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकते थे।

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