विमर्श/अभिव्यक्ति संस्कृति

भारत के विश्वगुरु का क्या है मतलब ?

संजय तिवारी
असली विकास है मनुष्य की चेतना का विकास। भारत इसी विकास का आदिकाल से विश्वगुरु है।
लेकिन चेतन व्यक्ति भोगवादी नहीं होता। जो समाज जितना चेतन होता है उतना ही त्यागवादी होता है। विकसित चेतना के लिए भोग विलास क्षण भंगुर है। भोग विलास करने के लिए मनुष्य की चेतना का पतन जरूरी है।
ये जो बाजार है उसका पहला वार आपकी चेतना पर ही होता है। वह आपसे आपकी निर्णय क्षमता को छीन लेता है। इसके बाद वह आपको समझाता है कि कौन सी क्रीम लगाने से आपका चेहरा चमकेगा। कौन सी गाड़ी खरीदने से आपका रुतबा बढेगा। कौन सा जूता आपका स्टेटस बढायेगा।
जब बाजार आप पर अपने उत्पादों का प्रहार करता है तब तक आप अपनी चेतना खो चुके होते हैं। फिर आप बाहर के उत्पादों का ढेर लगाकर भीतर कुछ बड़ा होने का प्रयास करने लगते हैं। शायद मेरा कपड़ा देखकर लोग थोड़ा मुझे महत्व दें। या कि गाड़ी देखकर। या फिर कोई पद पदक देखकर। फिर जीवन भर आप यही सब जुटाने में जुट जाते हैं। आपको कभी अहसास ही नहीं होता कि जो होने के लिए मैं ये सब जुटा रहा हूं, वो होने की संभावना खोने के बाद ही तो बाजार की तरफ मुड़ा हूं। इनमें से कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो मेरी चेतना का विकास कर सके।
चेतना का विकास संग्रह और भोग से नहीं होता। चेतना का विकास निग्रह और त्याग से होता है। और जो विकसित चेतना के लोग हैं, वो जहां हैं, वहीं प्रदीप्त हैं। फटेहाल, नंगे पैर भी वो आसमान की ऊंचाइयों पर विराजते हैं। विकसित चेतना के लोग क्षितिज पर चमकते उस सूर्य के समान होते हैं जो अपना आकर्षण आप होते हैं।

( संजय तिवारी के फेसबुक टाइमलाइन से साभार )

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