विमर्श/अभिव्यक्ति

अरब देश के लोग भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों को दोयम दर्जे की नस्ल मानते हैं

संजय तिवारी
सऊदी अरब, यूएई, ईरान, इराक, कुवैत, बहरीन या फिर तुर्की में कोई गैर मुस्लिमों को इस्लाम कबूल करवाने के चक्कर में नहीं पड़ता। खाड़ी देशों का संघर्ष मजहब का नहीं बल्कि नस्ल का है। इस्लाम उनके लिए डिबेट का हिस्सा नहीं है। उन्हें लगता है ये तो है ही। उनके लिए प्रमुख है उनकी नस्ल। इसलिए अभी हाल में ही सऊदी अरब ने पाकिस्तान की महिलाओं से निकाह पर रोक लगा दिया है। पाकिस्तान या भारत में जहां के मुसलमान दिन रात सऊदी के मुसलमानों से भाईचारा दिखाने के लिए न केवल उनकी संस्कृति को इस्लाम के नाम पर अंगीकार कर लेते हैं बल्कि सऊदी को अपना आका मानते हैं। वही सऊदी के लोग भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों को हिन्दी समझते हैं। यानी अपने से दोयम दर्जे की नस्ल जिससे शादी विवाह का संबंध नहीं बनाया जा सकता।
ये जो नस्लीय श्रेष्ठता है उसी के कारण ईरान के मुसलमान भारतीय हिन्दुओं को अपना भाई मानते हैं। वो मानते हैं कि दोनों आर्य हैं। लेकिन इधर उपमहाद्वीप के मुसलमान हिन्दुओं से वैसा अपनापन नहीं रख पाते जैसा ईरान वाले रखते हैं। यहां तो हिन्दू हो या मुसलमान दोनों एक ही नस्ल हैं। फिर मुसलमानों के मन में हिन्दुओं के प्रति इतनी घृणा क्यों रहती है? आखिर क्यों वो हिन्दुओं को एक नस्ल के तौर पर नहीं देख पाते? आखिर भारत का मुसलमान कहीं बाहर से तो आया नहीं। आज मुसलमानों की जनसंख्या में शायद एक प्रतिशत मुसलमान ऐसे हों जो किसी न किसी हमलावर के साथ भाड़े के सैनिक बनकर लड़ने आये हों। वरना, 99 प्रतिशत तो यहीं के है। जातियां भी लगभग वही हैं जो हिन्दुओ की है।
फिर केवल मजहब बदलने के कारण उन्हें अपना ही खून पराया क्यों लगने लगता है जिसे अपने मजहब में खींचकर ले आना है। मेरा मानना है कि भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान सबले ज्यादा दिग्भ्रमित और दकियानूस है। उन्होंने अपना पूरा परिचय अपने अस्तित्व को झुठलाने पर खड़ा कर रखा है। उनके मुल्ला मौलवी दिन रात उनके दिमाग में ये जहर भरते रहते हैं कि वो हिन्दुओं से बिल्कुल अलग हैं, जबकि सच्चाई में वो बिल्कुल अलग नहीं है। उनके पूर्वजों ने किसी न किसी दबाव में अपना मजहब बदला है। नस्ल उनकी आज भी वही है जो मुसलमान बनने से पहले थी।
ये बात आज मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बांग्लादेश में हिन्दू इसी नस्लीय भेदभाव का शिकार हो रहा है। वहां के बंगाली मुसलमान अपने बंगाली भाइयों से इसलिए नफरत करते हैं क्योंकि वो इस्लाम से इतर हैं। वो इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि हिन्दुओं का धर्मांतरण कराकर उन्हें इस्लाम के रास्ते पर लाया जाए। बांग्लादेश में भी हिन्दुओं का उसी तरह उत्पीड़न हो रहा है जैसे पाकिस्तान में। अभी कुछ दिन पहले हिन्दुओं की एक पूरी बस्ती को सिर्फ इसलिए उजाड़ दिया गया क्योंकि हिन्दुओं ने किसी मौलाना की आलोचना कर दिया था। मोदी ने बांग्लादेश जाकर बंगाल के चुनाव के लिए जो जो जरूरी था वो सब किया लेकिन उनके लिए कुछ नहीं किया जिनको सचमुच भारत के मदद की जरूरत है। मोदी तो संकेतों के उस्ताद हैं। अपने हाव भाव, मेल मुलाकात से चाहते तो बांग्लादेशी हिन्दुओं के लिए कोई संकेत दे सकते थे। उन्होंने नहीं दिया। मिले भी तो उसी मतुआ समुदाय के लोगों से जिनका वोट इधर बंगाल में लेना है।

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